“खुद की तलाश “

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खुद में ही तुम्हें ढूंढती हूँ कहीं,
न जाने क्यों तुम मिलती ही कहीं नहीं,
खुद से ही पूछतीं हूँ तुम्हारा पता,
सोचती हूँ मिल जाता कोई अता।
मुझमें है सवाल कई ना देता जवाब कोई,
उलझी सी रहती हूँ खुद में,
ढूंढती हूँ तुझको हर पल में,
तु जो मिल जाएँ तो पूछुगी तुझसे।

दिल के अरमा बोलूँगी तुझसे,
ना जाने तेरा क्या पता है,
क्या इसमें मेरी ही कोई ख़ता है?
कहते हैं मुझमें समझ नहीं।

तू जो अाए तो समझ भी आ जाएँ,
तू कहीं किसी रोज मुझे मिल जाएँ,
बस यही आरजू है मेरी,
मेरी ये तलाश पूरी हो जाएँ…..।

सपना तिवारी
कल्याण, मुम्बई।


prachi

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