जीवन दर्शन : दुनिया मेरी नज़र से | सलिल सरोज

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ये प्रश्न बड़ा गूढ़ है

कि जीवन बदलता है
या परिस्थितिवश मानव
और कैसे बदल जाते हैं
संग उनके मानवीय मूल्य
जिसके विकास और ह्रास 
की अवधारणा इतिहास के पन्ने तय कर देती है 
या फिर कोई अभेद्य विचार धाराएँ
जीवन अनवरत अपनी गति से बहती चली जाती है
किसी उच्छृंखल नदी की भाँति
अपने गन्तव्य को पाती चली जाती है
समय के कालखंड पे 
आशा-निराश के परिधि पे
मनःस्थिति जब अनुकूल हो तो
जीवन सावन की बौछार लगता है
जब मनःस्थिति प्रतिकूल हो तो
जीवन खाली और बेजार लगता है
ये सब दशा और दिशाओं का खेल है
हृदय और मस्तिष्क का अपरिहार्य मेल है
जीवन की सार्थकता उसको भरपूर जीने में है
उसके बाद मौत आए तो,वो ज़हर भी पीने में है
जीवन हर पल,हर क्षण,हर घड़ी 
महसूस करने की चीज़ है
इसे न समझ कर ययाति की तरह भटकना कितना अजीब है


लेखक सलिल सरोज के बारे में संक्षिप्त जानकारी के लिए क्लिक करें।


prachi

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