तुम ही कमल हो

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तुम्हें देखता हुँ तो ऐसा लगता है,
 जैसे मेरे जीवन में खुशीयों का मौसम आ गया हो,
तुम्हारी सुरमयी नयनों में,
 मेरे दिल की धड़कन धड़कती जा रही हो,
 अपनी हालात कैसे बयान करूँ मैं तुम्हें,
 ऐसा लगता है तुम मेरे जिश्म की जान बनती जा रही हो।
तुम्हारे होठों की मुस्कान से घर मैने सजाया है,
 तुम्हारी मासूमियत ने मेरे दिल में एक और दिल बनाया है,
तुम सावन की बादल बन कर,
 मोहब्बत की बरसात कर जाती हो,
तुम अपनी अधरों की लालिमा से,
 गुल को गुलजार कर जाती हो,
और तुम्हारे काले घने जुल्फों में,
 मैं सिमट कर रह जाता हुँ।
तुम्हें देखता हुँ तो ऐसा लगता है,
 जैसे मेरे जीवन में खुशीयों का मौसम आ गया हो,
तुम मेरी शायरी और गजल हो,
 तुम ही आशीष की कमल हो,
लहरों के जैसा इठलाना तुम्हारा,
रूठती ऐसी हो जैसे कुम्हला जाती है कली गुलाब की,
तुम्हारा मुस्कुराना और शर्माना,
ऐसा लगता है,
तुम ही आशीष की कमल हो।


Written by : Asheesh Kamal Shrivastwa (Deputy Editor) 
Assistant Librarian, School of Planing and Architecture (SPA) Vijayawada, A.P.



prachi

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