दिनेश गुप्ता ‘दिन’की कुछ प्रेरक कविताएं

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बंद आँखों मे कितने सारे ख्वाब हे !!

बंद आँखों मे कितने सारे ख्वाब हे, सबके सब सच होने को बेताब हे
निगाहों मे चमक मंजिल की, दिल मे ख्वाहिशें बेहिसाब हे
जवाँ हर एक उम्मीद आँखों मे, जिंदा हर एक अहसास हे
इरादों मे उफान, होसलों मे तूफान, हसरते बेतहाश हे
पांव ज़मीं पर रहे और उड़ना मुझे आसमानो मे
सच की दुनिया झूटी, जीना हे मुझे अरमानो मे
अब ना उतरेगी कभी, बोतले पैमानो मे
तोड़कर निकला हे जो साकी, जाम सब मयखानो मे
छुटा अँधेरा, छाई रौशनी दूर तलक, ज़मीं पर उतरा कोई आफताब हे
बंद आँखों मे कितने सारे ख्वाब हे, सबके सब सच होने को बेताब हे

ऐसा एक जहान मिले

ऐसा एक जहान मिले , खुशियों का असमान मिले 
चाहे लाख तूफान मिले , पर हर दिल को चाह अरमान मिले 
सपनो को सम्मान मिले , होसलो को अंजाम मिले
खवाबो की जमी मिले , शोहरतो का असमान मिले 
जात पात , मज़हबो का ना कोई नामो निशान मिले
हर गली हर मोड़ पर , हर शक्ल हर सूरत में बस इन्सान मिले

काश कभी वो दिन भी आए , काश कभी वो दिन भी आए 
अल्ल्लाह मिले मंदिर में , मज्सिद में भगवान मिले 
अल्ल्लाह मिले मंदिर में , मज्सिद में भगवान मिले

चलना होगा जलना होगा………

हवन कुण्ड की अग्नि मे अरमानों को दलना होगा
फिर किसी दधिची की हड्डियों को गलना होगा
वक्त नहीं श्रृंगारों का, पथ है अंगारों का
चलना होगा जलना होगा, जलना होगा चलना होगा 
हो घने गहरे अँधेरे, गम कितने डाले डेरे
प्रेम वशीभूत कितनी निगाहें तुमसे आँखे फेरे
तुफां रस्ता रोके, चट्टानें पथ को घेरे
होने होंगे एक दिन खुशियों के पग फेरे
अँधेरे कितना भी तांडव कर ले, सूरज को निकलना होगा
कितना भी शोर मचा ले तुफां, मौसमों को बदलना होगा
दौर नहीं मयखानों का, वक्त है बलिदानों का
फिर किसी भगत राजगुरु आज़ाद को घर से निकलना होगा
 चलना होगा जलना होगा, जलना होगा चलना होगा 
अनगिनत सपने, अगणित इच्छाएँ,
असीमित आकांक्षाएँ, असंख्य महत्वाकांक्षाएँ
राष्ट्रप्रेम की ज्वाला में अरमाँ सब दलना होगा
वक्त है ललकारों का,गुंज उठे जयकारों का
वक्त नहीं श्रृंगारों का, पथ है अंगारों का
चलना होगा जलना होगा, जलना होगा चलना होगा ……

ठहरा हुआ है वक्त सदियों से, अब तो…..

जल पड़ी चिंगारी को और सुलगना होगा………………
बुझती राख के ढेरों को शोलों में बदलना होगा……….
उबालो ज़रा लहू बदन का, थामों मशालें हाथों में
ठहरा हुआ है जो वक्त सदियों से, अब तो बदलना होगा
फिर किसी गाँधी की आँखों में ख्वाबों को पलना होगा
फिर किसी दधिची की हड्डियों को गलना होगा……
वक्त नहीं श्रृंगारों का, पथ है अंगारों का……………..
चलना होगा जलना होगा, जलना होगा चलना होगा
जब तक प्राण रहे शरीर में, ये ज्योत जलानी है…………………
बहुत हुई मनमानी, लिखनी अब नयी कहानी है………………..
जम गया लहू तुम्हारी नसों का या अब भी इसमें रवानी है…….
आओ देखें ज़रा इन ज़वान जिस्मों में, कितना खून है, कितना पानी है
प्राण रहे जिस्म में या इस दहलीज़ पे माथा फूटे……
देश हित की रक्षा में निज हित छूटे तो छूटे
हाथ रहे हाथों में प्रेयसी का या वादा टूटे
वृक्ष हुआ पुराना अब जरा इसमें नव अंकुर फूटे
बुनियादें तो हिली है कई बार, अब जरा ये दीवार टूटे
अब न कोई गद्दार बचे, अब ना ये वतन लूटे……….
साँसों से चाहे नाता टूटे, हाथो से ना तिरंगा छूटे….
अँधेरे कितना भी ताण्डव कर ले, सूरज को निकलना होगा
कितना भी शोर मचा ले तूफाँ, मौसमों को बदलना होगा
दौर नहीं मयखानों का, साकी का, जामों का, पैमानों का
वक्त है पुकारों का, गीत गूँजे जयकारों का
काँप उठे जर्रा जर्रा, देश के गद्दारों का
दौर नहीं फनकारों का, वक्त नहीं श्रृंगारों का
गीत गुँजे जयकारों का, शोर उठे ललकारों का
ठंडी पड़ी शिराओं का लहू उबलना होगा
फिर किसी भगत राजगुरु आज़ाद को घर से निकलना होगा
ठहरा हुआ है जो वक्त सदियों से, अब तो बदलना होगा
हो रहा चीरहरण अपने ही मौलिक अधिकारों का
बेमोल बिकते व्यर्थ शब्दों के व्यापारों का
अनगिनत सपने, अगणित इच्छाएँ,
असीमित आकांक्षाएँ, असंख्य महत्वाकांक्षाएँ
राष्ट्रप्रेम की ज्वाला में अरमाँ सब दलना होगा
वक्त नहीं श्रृंगारों का, पथ है अंगारों का………
चलना होगा जलना होगा, जलना होगा चलना होगा
ठहरा हुआ है जो वक्त सदियों से, अब तो बदलना होगा
बहुत हुआ अपना अपना घर बार, माँ का प्यार दुलार
देश के बेटों अब तो घर से निकलना होगा
जल पड़ी चिंगारी को और सुलगना होगा
बुझती राख के ढेरों को शोलों में बदलना होगा……….
ठहरा हुआ है वक्त सदियों से, अब तो बदलना होगा 

दिनेश गुप्ता ‘दिन’

लेखक के बारें में जानकारी के लिए यहां क्लिक करें।


prachi

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