नभचर से नभ छीन चुके हैं | सलिल सरोज

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नभचर से नभ छीन चुके हैं

खेत-खलिहान छीन चुके हैं
घोंसले बनाने को दीवारें तो
खाना-पीना भी छीन चुके हैं
कृत्रिम प्रकृति की रचना में हम
इनका चहचहाना छीन चुके हैं
जहाँ-तहाँ हैं ये व्याकुल पंछी
इनसे उड़ना तक छीन चुके हैं
अपनी-अपनी लालच में आके

prachi

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