नाराज़ हूँ तुमसे | श्वेता सिन्हा

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हाँ मैं नाराज़ हूँ तुमसे,
चाहकर भी झटक नहीं पाती हूँ,
तुम्हें ख़्यालों से अपने
कैसे निकालूँ
अनवरत ताकती 
उदास अनमनी-सी
झरोखे से बाहर 
पीपल के पेड़ पर
मैना की अनगिनत जोड़ियाँ 
जो एक दूसरे के पीछे
भागती-बतियाती
हरे पत्तों का मौन
हवाओं के परों पर झूमना
रह-रह कर मेरी खुली लटों को छेड़ना
कुछ नहीं अच्छा लग रहा,
बादल के सफ़ेद टुकड़े
ख़ूबसूरत पहाड़ों पर उतर आये हैं
रूई के फाहों से ढके गहरे हरे पहाड़ 
भी उदास लग रहे है हैं
फोन पर बार-बार नज़र डालती 
अनगिनत बार मैसेज चेक करती
हर बार निराश होकर 
कुरदेने लगती हूँ 
नाख़ुन से खिड़की पर लगे पेंट को
जो बारिश-धूप में भीग कर
हल्के पपड़ीदार हो गये हैं।
खीझकर बेमन से
 ख़ुद को डुबोना चाहा किताबों में
पर हर किरदार में तुम्हारी 
कोई बात याद आने लगती है
जोड़ने लगती हूँ हर कड़ी तुमसे
फेंक कर किताबें
रेडियो ऑन किया,
पर दर्द में डूबे गाने के बोल
बहुत बेचैन कर रहे,
हर शब्द पलकें नम कर जा रहा
तुम्हें नहीं आता मेरा ख़्याल ?
मेरा कोई पल बिना तुम्हें सोचे
गुज़रता ही नहीं,
दिन तो बीत गया बेचैनियों में,
शाम को फिर छत के मुंडेर पर 
हथेलियों को गालों पर टिकाये
तन्हा आसमां में समाते
सिंदूरी सूरज की किरणों में
तुम्हारे ही अक्स दिखते है
शायद तुमने मैसेज किया होगा
फिर चले जाओगे मुझे न पाकर
पूछोगे भी नहीं कुछ
पर आज मैं नाराज़ हूँ
पूनम का चाँद रिस रिसकर
आधा रह गया है
अटका है पीपल की फुनगी पर
एकटक मुझे ताके जा रहा तुम्हारी तरह
जी करता है तोड़ लाऊँ उसे
रख लूँ बाँधकर लाल दुपट्टे में
तुम्हें भेंट करना चाहती हूँ
तुम्हारे दिनभर की थकान से
दुखते तलवों पर रखने को
आधी रात बीत चुकी है करवटों में,
तुम भी जागते होगे पता है मुझे
तुम्हारे ही.ख्यालों में गुम हूँ हर पल
पर मैं तुमसे नाराज़ हूँ न
तुम नहीं मनाओगे,जानती हूँ
जानते तो हो तुम भी,
मैं ऐसे तुमसे बात किये बिना
रह भी नहीं सकती 
चंद पल में ही तुमसे वो सब कुछ
पा लेती हूँ जो जीने के लिए
जरूरी है बहुत।


श्वेता सिन्हा जी कवि व नियमित ब्लॉगर है अौर जिनका ब्लॉग ‘मन के पाखी’ बहुत प्रसिद्व है। आपसे E-Mail : swetajsr2014@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।


prachi

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