भावुक हूँ; तो, कविता लिखता हूँ | आशीष कमल

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कभी भावनाओं से,
कभी ममता, कभी स्नेह की पराकाष्ठा से,
कभी दर्द में निकलते आँसुओं, कभी खुशी में भींगते अंखियों से,
तो कभी;
शब्द की कला से; कविता बनाता हूँ।
भावुक हूँ; तो, कविता लिखता हूँ।
कभी सड़क पर अकेले पार करते,
बूढ़े-थके पिता के, माथे से निकले; पसीने की खुशबू से,
कभी चिलचिलाती धूप में,
अपने बच्चों को आँचल में छुपाती मां से,
तो कभी;
अस्पताल के उस वार्ड में, पत्नी के असहनीय पीड़ा के दर्द से आहत,
पति के निकलते आँसूओं से; कविता बनाता हूँ।
दर्द समझता हूँ; तो, कविता लिखता हूँ।
कभी रोटी के लिए कचरों को, बीनते उन बच्चों से,
कभी रिहायशी इलाकों में, पकवान खाते उनके पालतू कुत्तों से,
तो कभी;
भूख को नजरअंदाज करके, दुश्मनों से लड़ते,
उन वीर सेनाओं के वीरता पर; कविता कहता हूँ।
दर्द देखता हूँ; तो, कविता में बयान करता हूँ।
कभी माँ के सीने से लगा, बच्चों की किलकारी से,
कभी वृद्धाश्रम में, सिसकती माँ की चित्कार से,
कभी पुत्रवधू के लिए, माथा टेकते उन माँ-पिता से,
तो कभी; गर्भ में पल रही पुत्री को,
इहलोक से परलोक में भेजने के लिए, उन माँ-पिता पर; सोचता हूँ।
जब तड़प जाता हूँ; तो, कविता लिखता हूँ।
कभी अपने दर्द को बयान नहीं कर पाता,
कभी खुशी से शब्द, नहीं निकाल पाता,
कभी तड़प जाता हूँ, मोहब्ब्त के फुहार के लिए,
कभी रो पड़ता हूँ, माँ के प्यार के लिए,
तो कभी;
पिता की याद आ जाती है, तो; उनके यादों को संजोता हूँ।
बावला हो जाता हूँ; तो, कविता लिख देता हूँ।
कभी ईश्वर से लड़ जाता हूँ, अधिकार के लिए,
कभी बेबस हो जाता हूँ, जब इस संसार के लिए,
कभी मित्रों के, सकारात्मक भाव के लिए,
कभी; जब निरूत्तर हो जाता हूँ, अपने स्वभाव के लिए,
कभी क्रोधित हो जाता हूँ, लोगों से लोगों का दुत्कार देखकर,
कभी बहन की रक्षा नहीं हो पाती इस पुरूष समाज में,
तो कभी;
कविता में ही अपने, सपनों को जी लेता हूँ।
तो कवि हूँ; कविता, लिख लेता हूँ।

लेखक अक्षय गौरव पत्रिका के प्रधान संपादक है अौर आप सामाजिक, साहित्यिक तथा शैक्षिक परिवेश पर लेखन करते हैं। आपसे E-Mail : asheesh_kamal@yahoo.in पर सम्पर्क किया जा सकता है।

© उपरोक्त रचना के सर्वाधिकार लेखक एवं अक्षय गौरव पत्रिका पत्रिका के पास सुरक्षित है।

prachi

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