मरघट | धुव्र सिंह ‘एकलव्य’

0
1

मैं हार गया हूँ
तुझसे
कह -कह कर
सत्य की बातें
लाचार हुआ मैं
ख़ुद से
जो अपने कष्ट
सदा दें
पतवार हूँ खेता
प्रतिक्षण
बन मानव का
रक्षक
पर स्वयं ही
डूबा जाता
बाँध पाँव में
पत्थर
हूँ निशा काटता
सदियों 
बनकर
मरघट का
स्वामी
स्वयं हस्त से
अग्नि जलाऊँ
नहीं है मुझसा
पापी
शवदाह के मूल्य हूँ
माँगू
घोर मैं कितना
निर्लज्ज
शव के परिजन
विलाप करें
मैं हूँ यम सा
निर्मम
कोई भेद नही है
सन्यासी और क्या
पापी
चिता की लपटें
निगल रहीं हैं
सत्य, सनातन
बाक़ी
शव तो मिलेंगे
निश्चित
अपने मूल अवयव में
नहीं रहूँगा तेरे
मिथ्या इस झांसे में
बनकर नित्य जलूँगा
मरघट सा
सावन में

हाँ, मैं हार गया हूँ
कह-कह कर
सत्य की बातें


ध्रुव सिंह एक युवा कवि व ब्लॉगर है अौर ‘एकल्वय’ नाम से ब्लॉग लिखते है। आपसे E-Mail : dhruvsinghvns@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।

© उपरोक्त रचना के सर्वाधिकार लेखक एवं अक्षय गौरव पत्रिका पत्रिका के पास सुरक्षित है।

prachi

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here