विचलित सा तू मन है कैसा | ध्रुव सिंह

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विचलित सा तूँ मन है कैसा
तरु छाया के अम्बर जैसा
कभी प्रसन्न तूँ, कभी है विस्मृत
भींगा-भींगा, डरा-डरा सा
एक पल को तूँ उड़े स्वप्न में
रोज बिठाये नील गगन में
इधर-उधर मंडराये नभ सा
चले हवा के झोंके जैसा
रुके कभी जो प्रलय सा लगता
शांत हुआ तूँ, निर्मल जल सा
काया तो तेरी है चंचल
बदले जो तूँ लगता मृत सा
नियम ये प्रकृति का कहता
हो हताश ना मानव जैसा
बुन जीवन तूँ कर्मठ बनके
मेहनतकश मकड़ी के जैसा


ध्रुव सिंह एक युवा कवि व ब्लॉगर है अौर ‘एकल्वय’ नाम से ब्लॉग लिखते है। आपसे E-Mail : dhruvsinghvns@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।

© उपरोक्त रचना के सर्वाधिकार लेखक एवं अक्षय गौरव पत्रिका पत्रिका के पास सुरक्षित है।

prachi

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