वो जितनी देर रहा, मेरे साथ रहा | सलिल सरोज

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वो जितनी देर रहा, मेरे साथ रहा 

मैं कारी बदली,  वो बरसात रहा
मुझे  बस उस तक ही पहुँचना है
मैं उसका अंत, वो शुरुआत रहा
ऐसे कैसे छूट जाएगी ये दिलदारी 
मैं उसका सहर,वो मेरी रात  रहा 
ये जिस्म से काफी दूर का सफर है
दो रूहों का  ऐसा मुलाक़ात रहा  
मैं उस पर  क्यों न मर -मर जाऊँ 
मैं उसका ज़ुस्तज़ू,वो कायनात रहा 

prachi

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