शब्द (कविता) | श्वेता सिन्हा

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मौन हृदय के आसमान पर

जब भावों के उड़ते पाखी,
चुगते एक-एक मोती मन का 
फिर कूजते बनकर शब्द।
कहने को तो कुछ भी कह लो
न कहना जो दिल को दुखाय,
शब्द ही मान है, शब्द अपमान
चाँदनी, धूप और छाँव सरीखे शब्द।
न कथ्य, न गीत और हँसी निशब्द
रूंधे कंठ प्रिय को न कह पाये मीत,
पीकर हृदय की वेदना मन ही मन 
झकझोर दे संकेत में बहते शब्द।
कहने वाले तो कह जाते हैं  
रहते उलझे मन के धागों से,
कभी टीसते कभी मोहते 
साथ न छोड़े बोले-अबोले शब्द।
फूल और काँटे,हृदय भी बाँटे
हीरक, मोती, मानिक, माटी, धूल,
कौन है सस्ता, कौन है महँगा 
मानुष की क़ीमत बतलाते शब्द।


श्वेता सिन्हा जी कवि व नियमित ब्लॉगर है अौर जिनका ब्लॉग ‘मन के पाखी’ बहुत प्रसिद्व है। आपसे E-Mail : swetajsr2014@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।


prachi

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