सलिल सरोज जी दो रचनाएं

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जो रहगुज़र हो जाए तेरे तन बदन का

जो रहगुज़र हो जाए तेरे तन बदन का
मुझे वही झमझमाती बारिश कर दो

तुमसे मिलते ही यक ब यक पूरी हो जाए
मुझे वही मद भरी ख़्वाहिश कर दो

जो रुकती न हो किसी भी फ़ाइल में
मेरी उसी “साहेब” से गुजारिश कर दो

गर लैला-मजनूँ ही मिशाल हैं अब भी
फिर हमारे भी इश्क़ की नुमाइश कर दो

वो सुनता बहुत है तुम्हारी बातों को
खुदा से कभी मेरी भी सिफारिश कर दो

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ये लोकतंत्र का तमाशा मैं रोज़ यहाँ देखता हूँ

ये लोकतंत्र का तमाशा मैं रोज़ यहाँ देखता हूँ
मैं अँधेरे में रहता हूँ, पर कोई अंधा  नहीं हूँ

लगता है आप भाषणों से सब को खरीद लेंगे
मैं बाज़ार में बैठा हूँ, पर कोई धंधा नहीं हूँ

हैं जान बहुत बाकी अभी,यूँ जाया न कर मुझे
मैं जनाज़े में तो हूँ, मैय्यत का कंधा नहीं हूँ

मैं जीके ही जाऊँगा ज़िन्दगी की सब मस्तियाँ
मैं इसी समाज का हूँ, पर रिवाजों से बंधा नहीं हूँ


prachi

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