हम धार्मिक हैं

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प्रधान जी हम भारत के लोगों का धर्म से अधिक जुडाव देखने को मिलता हैं। हम धर्म के नाम पर एक दुसरे का खून बहाने को तैयार हो जाते है। भारत का इतिहास अगर देखा जाएं तो सबसे अधिक दंगें धर्म के नाम पर ही हुए है। जिसमें अब तक अनगिनत लोग मौत के आगोश में जाकर सो गये, करोडों रुपये की सम्पत्ति स्वाह हो गई। क्या धर्म इसी का नाम है ?
शर्मा जी हम लोगो ने धर्म का अर्थ नही समझा।
क्या मतलब ? हम अब तक धर्म को ही नही समझ पाए।
हाँ प्रधान जी, हम धर्म को समझ नही पाए, इसी कारण आज हमारे बीच खाईया बढती चली गयी। आज हम जिस धर्म को लेकर लडते है, उसमें केवल हमारा स्वार्थ छिपा है।
शमा्र जी धर्म में स्वार्थ! मैं तुम्हारे कहने का मतलब नही समझा। धर्म तो स्वार्थ नही सिखाता।
हां मेरे कहने का मतलब भी वही है जो तुम कह रहे हो। फर्क केवल इतना है,हम धर्म को उतना ही मानते है जहां तक हमारे स्वार्थ प्रभावित न हो । जहां स्वार्थ प्रभावित होने लगते है हम वही धर्म की बात करना छोड देते है।
वह कैसे प्रधान जी ?

भारत में एक धर्म ऐसा है जहां बहु पत्नियों की प्रथा है अगर आप बहु पत्नियों को रखने वाले से कहो-यह क्या हो रहा है। बस धार्मिक उन्माद को जन्म दे दिया जायेगा। लेकिन वह पत्नियों की पृथा क्यूं और कैसे शुरु हुई उस पर ध्यान देना जरुरी है। जो आज के युग में बहु पत्नियों की प्रथा समाज के हिसाब से उचित नही है।
वह कैसे मुझे समझाओ।
यह उस धर्म के प्रारम्भ की बात है जब धर्म के नाम पर युद्ध हुआ करते थे जिसमें केवल पुरुष ही भग लिया करते थे। युद्ध में लोग मारे जाते थे। उनकी पत्नि विधवा हो जाया करती थी। विधवाओ के सामने जीविका चलाने के लिए संकट था। विधवाओं को सम्मान पूर्वक जीने के लिए तथा विधवाओ की जीविका चलाने के लिए कहा गया जो सम्पन्न हैं वह ऐसी औरतो से विवाह करके उन्हें समाज की मुख्य धारा में बनायें रखें।
परन्तु आज हालात वह नही हैं। आज का मानव केवल वासना को शान्त करने के लिए नई उम्र की कन्याओं से विवाह करता हैं। अब बताओं ऐसे लोग धर्म की आड लेकर बहुपत्नियों का चलन अपना रहें है या नही। धर्म कहता है ऐसी औरतों से विवाह करो जो समाज में कमजोर हो। अब बताओ इसे धर्म कहेगें ा कुछ और ?
शर्मा जी यह बुराई आज समाज के लोगों में आम है। हमारी संस्कृति में औरत को सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा, सीता न जाने कितने नामों से पुकारा जाता हैं। हमें स्त्री का सम्मान करना चाहिए। स्त्री ही समाज का कर्णधार है। हम दिखाने को तो उसे सम्मान देते है,उसके सम्मान में बडी-बडी सभाएं करते हैं। फिर भी नारी जैसे आदि काल में थी वही दिशा आज के प्रगति युग में देखने को मिलती है। आज समाचार पत्रों की सुर्खिया रेप काण्ड की देखने को मिलती है तो बताओ हम धर्म को कहा मानने वाले हुए। जहां तक धर्म की बात है देखने में आया हैं नारी, पुरुष से ज्यादा धर्मिक होती है। 

अगर मैं केवल पुरुषों को धार्मिकता का नाम दूं। तो यह समाज के साथ अन्याय होगा। आज के युग में पुरुष के साथ-साथ स्त्री भी बराबर की दोषी देखने को मिलती है। हो सकता हैं इनकी तादाद कम हो परन्तु समाज कुछ लोगों के कारण पूरे समाज को बुरा मानने लगे। यह समाज के साथ अन्याय होगा। आज हम अपने को जितना धार्मिक दिखाने की कौशिश करते है, अगर सच्चे मन से धर्म का अनुसरण अपनी जिन्दगी में कर ले तो समाज की समस्त बुराई समाप्त हो जायेगी। लेकिन आज हम धर्म के नाम पर केवल अपने झूंठे स्वाभिमान की लडाई लडकर समाज को करने के अलावा और कुछ नही कर रहे हैं।अगर वाकई हमें समाज को प्रगति पर ले जाना है तो सच्चे मन से धर्म का अनुसरण करना होगा। धर्म किसी के प्रति घृण नही केवल प्रेम सिखाता है। धर्म में अहंकार के लिए कोई स्थान नही हैं। आओ हम स भारतीय बनकर एक दुसरे को भाई मानकर ऐसे समाज का निर्माण करें जहां द्वेष, घृणा न हो। सब अपने-अपने धर्म का पालन करते हुए देश में सदभावना बनाते हुए देश को प्रगति पर ले जाने का प्रयत्न करें तथा नारी को वैसा ही सम्मान दे, जैसे हमारे धर्मशास्त्र के अनुसार कहा गया है। यही हमारी प्रगति का मार्ग हैं।

डा0 फखरे आलम खान
अमता हाउस, जैदी नगर सोसाईटी, मेरठ
(लेखक अक्षय गौरव पत्रिका में प्रधान संपादक है।)


prachi

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